गांधी जी ने भारत में एक नैतिक समाज की स्थापना का स्वप्न देखा था – प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी

आगरा। “गाँधी जी के मूल्य शाश्वत हैं, जिनकी प्रासंगिकता प्रत्येक काल में सिद्ध है, गाँधी कोई ईश्वर नहीं जो उनसे जीवन में त्रुटियां न हुई हों और इसी कारण गाँधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के सम्यक मूल्यांकन के लिए इस गोष्ठी का आयोजन हुआ है।’’ यह कहना है मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो0 हेरम्ब चतुर्वेदी का। वह आगरा काॅलेज, आगरा के इतिहास विभाग एवं पत्रकारिता संकाय के संयुक्त तत्वावधान में ’’महात्मावादी के विचार एवं वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता’’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि गाँधी की सादगी, नैतिकता, प्रेम, करूणा एवं बन्धुत्व जैसे मूल्य चिर स्थायी हैं। सत्य एवं अहिंसा के आधार पर गाँधी ने एक नैतिक समाज की स्थापना का स्वप्न देखा था और भारत को वह इसी दिशा में अग्रसर करना चाहते थे। यह बात अलग है कि कभी-कभी उनमें हठधर्मिता दिखाई पड़ती थी, किन्तु उसका उद्देश्य सदैव सकारात्मक रहता था।

मुख्य अतिथि महापौर नवीन जैन ने बोलते हुए कहा कि महात्मा गाँधी के तीन बन्दर बहुत प्रसिद्ध हैं। जो न बुरा देखना, न बुरा बोलना व न बुरा सुनने का प्रतीक हैं लेकिन आज इसका उल्टा हो रहा है। लोग जब दूसरे की आलोचना कर बुरा बोलते हैं तो दूसरों को यह सुनना बहुत अच्छा लगता है। यदि कोई दुर्घटना हो जाये तो लोग देखते रहते हैं और वीडियो बनाते रहते हैं। पीड़ित की सहायता के लिए कोई आगे नहीं आता। उन्होंने आगे कहा कि गाँधी जी अपने समस्त कार्य स्वयं करते थे, जबकि बदलते समय में आज प्रत्येक व्यक्ति नौकर रखता जा रहा है।

समारोह के विशिष्ट अतिथि महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रो0 सूरज प्रकाश पालीवाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि गाँधी व्यक्ति नहीं, वैचारिक आन्दोलन का नाम है। कृषकाय व्यक्ति ने एक विशाल साम्राज्य की नींव हिलाने का कार्य किया जो उनकी आत्मिक शक्ति का जीवन्त प्रमाण है। अन्याय एवं असत्य का निडरता के साथ सामना कैसे करना है, यह हमको गाँधी ने सिखाया। गाँधी की दूसरे विशेषता यह है कि उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को नई दिशा दी अपितु स्वाधीनता आन्दोलन में अनेक नेताओं को पैदा किया, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य का अहिंसा एवं सत्याग्रह के आधार पर अन्याय के विरूद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया। साथ ही उन्होंने गाँधी के निर्माण की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गाँधी ने केन्द्रीय भूमिका निभाते हुए कभी भी अपने अह्म को स्थान नहीं दिया और स्पष्ट कर दिया कि मेरा कोई वाद नहीं है, मैं अपने निजी अनुभवों के आधार पर जो मुझे सत्य प्रतीत होता है, वह निर्भीकता के साथ करने में विश्वास रखता हूं।

इससे पूर्व सेमिनार का शुभारम्भ महापौर नवीन जैन ने माॅ सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता प्राचार्य डा0 विनोद कुमार माहेश्वरी ने की, अतिथियों का आभार सह संयोजक डा0 अमी आधार निडर ने व्यक्त किया।

संयोजक डा0 अनुराग पालीवाल ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि दुर्भाग्य का विषय है कि गाँधी के देश में गाँधी की विचारधारा की प्रासंगिकता पर गोष्ठी करनी पड़ रही है। सामान्य भारतवासी जब गाँधी को मजबूरी का पर्याय बताता है तो यह तथ्य सोचने को विवश करता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।

सेमिनार में कुल 450 प्रतिनिधियों ने पंजीयन कराया। सेमिनार के प्रथम दिन कुल तीन तकनीकी सत्र चले जिनमें 105 शोध-पत्र प्रस्तुत किये गये। प्रथम तकनीकी सत्र के संसाधन व्यक्ति के रूप में डा0 अनुराधा गुप्ता, दूसरे तकनीकी सत्र में डा0 मधु वशिष्ठ एवं तीसरे तकनीकी सत्र में प्रो0 वेद त्रिपाठी ने संसाधन व्यक्ति के रूप में सत्रों का संचालन किया।

डा0 अपर्णा पोद्दार, डा0 अरूणोदय वाजपेयी, डा0 पियूष चैहान, डा0 शरद भारद्वाज, डा0 निशा राठौर, डा0 गीता यादवेन्दु, डा0 शादां जाफरी, डा0 महेन्द्र सिंह, डा0 वीके सिंह, डा0 जयश्री भारद्वाज, डा0 सुनीता गुप्ता, डा0 आशीष कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। डा0 मनोज कुमार रावत, डा0 दीपा रावत, डा0 रचना सिंह, डा0 कमलेश वर्मा, डा0 आरके सिंह, डा0 आरके श्रीवास्तव, डा0 पीवी झा, डा0 क्षमा चतुर्वेदी, डा0 डीसी मिश्रा, डा0 पूनम चाॅद, डा0 सीके गौतम, डा0 भूपेन्द्र चिकारा, डा0 गीता माहेश्वरी, डा0 कल्पना चतुर्वेदी, डा0 विवेक भटनागर, डा0 चन्द्रशेखर शर्मा, डा0 …

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