रे पानी कैसी ये तेरी कहानी, न क्षेत्र में पानी न आँखों में पानी

आगरा। शाहजहां और मुमताज की निशानी ताजमहल के नाम से जाने जाने वाली ताजनगरी आज बूंद-बूंद पानी को तरस रही है। यहां पानी को लोग खून खराबा पर आमादा हैं जिस कारण ना जाने कितने लोगों की जान चली गई। कितने लोग घायल हुए हैं। बावजूद इसके पानी आज तक नहीं मिला। ताजनगरी आगरा के टेडी बगिया इलाके में हम आपको लिए चलते हैं। जहां पानी की एक विकराल समस्या है। न पीने को पानी है। न नहाने को पानी है। और तो और लोग कहते हैं कि अधिकारियों की आंखों में भी पानी नहीं है तो फिर ताजनगरी में पानी कहां से आएगा।

बात हम करते हैं 15 से 20 साल पुरानी। बसपा, सपा और भाजपा सत्ता का परिवर्तन होता रहा। नेता, विधायक और सांसद के चेहरे चेंज होते रहे। चुनावों के टाइम पर नेताजी क्षेत्र में आए। पेयजल संकट दूर करने का भरोसा दिलाया और वोट मांग कर वादे से मुकर गए। 15 साल के इतिहास में यहां एक बूंद पानी नहीं आया। जलकल विभाग से लेकर नगर निगम और हर एक जनप्रतिनिधि क्षेत्र की पेयजल समस्या से भली भांति परिचित है मगर फिर भी यहां के लोग जहां बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं तो विभागीय अधिकारी और नेतागण चैन की नींद सो रहे हैं। लोग बताते हैं एक बाल्टी पानी के लिए उन्हें कितना रूपया खर्च करना पड़ता है। जब जाकर उनका गुजारा हो पाता है।

एत्माद्दौला के टेडी बगिया इलाके में रहने वाले लोगों को न खाने की चिंता और ना पहनने की चिंता। बस चिंता हर वक्त है तो पानी की। सुबह उठते ही लोग खाली बर्तन लेकर सड़क पर पानी के टैंकर का इंतजार करते हैं और घंटों इंतजार के बाद जब पानी का टैंकर आता है तो खाली बर्तनों से मारामारी शुरू होती है। कोई दो बाल्टी कोई चार बाल्टी पानी पैसे दे कर ले जाता है। ना यहां वाटर की सप्लाई के लिए पाइप लाइन डाली गई ना यहां समरसेबल हेडपंप लगाएं और ना ही यहां पेयजल समस्या निराकरण के लिए कोई ठोस काम हुए। पानी और दिन भर गुजारे के लिए लोग सुबह से शाम तक लड़ते हैं। जब घर का मुखिया नौकरी जाता है तो फिर पानी की लड़ाई की जिम्मेदारी बच्चे और उनकी पत्नी निभाती हैं।

पानी के लिए लड़ाई लड़ना अब यह रोज की परंपरा बन गई है। यहां के लोगों को रोज उठना है। खाली बर्तन लेकर सड़क पर घंटों इंतजार करना हैं और जैसे ही पानी का टैंकर आए तो पड़ोसी से लेकर अपने ही रिश्तेदारों से लड़ना है और पैसे देकर अपने घर के गुजारे के लिए पानी भी लेना है।

इन हालातों को देखकर लगता है कि यहां पानी की कमी नहीं है बल्कि अधिकारी और नेताओं की आंखों में पानी की कमी है। अगर नेताओं और अधिकारियों की आंखों में पानी होता तो शायद इन लोगों के लिए भी पीने को पानी होता। सवाल इस बात का है कि आखिर कब तक यह लोग नेताओं के हाथ तो ठगे जाएंगे। वोट देते रहेंगे। पानी को तरसते रहेंगे और विभागीय अधिकारी अपने वादे से मुकरते रहेंगे।

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