Home सामाजिक ‘चली तो अकेले थी, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया’

‘चली तो अकेले थी, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया’

by admin
'I was alone, people kept joining and the caravan was formed'
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आगरा। हौंसला बुलंद हो तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं। ऐसा ही कर दिखाया आगरा की नीलम सिरसा कुशवाह ने। अपने मुश्किल वक्त से सीखकर उन्होंने वेस्ट मैटेरियल (अनुपयोगी वस्तुओं) से उत्पाद बनाना सीखा और उसे बाजार में बेचकर अपना घर चलाने लगीं । स्वयं सहायता समूह के बारे में जानकारी मिली तो नीलम ने अपने जैसी महिलाओं का कारवां इकट्ठा कर लिया और अब वह 150 स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं।

नीलम बताती हैं कि उन्हें 21 अगस्त को लखनऊ में आयोजित मिशन शक्ति- 3.0 शुभारंभ कार्यक्रम में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों से सम्मान मिला तो उन्हें और उनके समूह की महिलाओं के हौंसले और बढ़ गए हैं। वह बताती हैं कि इससे पहले उनके स्वयं सहायता समूह को दिल्ली में भी सम्मान मिल चुका है ।
नीलम ने बताया कि वह पहले एक आम घरेलू महिला थीं। उनके पति को जब शराब की लत लग गयी तो उन्होंने अपने घर को संभालने के लिए खुद कुछ करने का निश्चय किया। उनकी बेटी आर्ट और क्राफ्ट काफी अच्छा बनाती थी। उन्होंने भी इसमें रुचि लेना शुरु किया। एक दिन उन्होंने अपने घर में पड़ा पुराना नेकलेस रिपेयर किया तो वह पहले से भी ज्यादा अच्छा लग रहा था। तब उन्हें आइडिया आया कि घर में पड़ी अनुपयोगी वस्तुएं (वेस्ट मेटेरियल) भी आय का साधन हो सकती हैं। इसके बाद उन्होंने वेस्ट मैटेरियल से ज्वैलरी बनाना शुरु कर दिया। उन्हें स्वयं सहायता समूह के बारे में पता चला, वह डूडा के ऑफिस गई और अपना एक समूह बनाया। इसके बाद कारवां शुरु हुआ और अब नीलम 150 स्वयं सहायता समूह चला रही हैं।

खराब रद्दी से जन्माष्टमी के लिए बनाए कान्हा

नीलम ने बताया कि वह पूरी तरह से वेस्ट मैटेरियल से ही उत्पाद बनाती हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर उनके समूह की महिलाएं रद्दी कागज और मिट्टी से कान्हा की मूर्ति बना रही हैं, इसके साथ ही खराब चुड़ियों से कान्हा का झूला भी बना रही हैं। इन्हें वह घर-घर जाकर बेचेंगी। इसी प्रकार से गणेश जी की मूर्ति, फूलदान, इत्यादि भी वह पुराने वेस्ट मैटेरियल से बना रही हैं।
नीलम के समूह में काम करने वाली ओमवती बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह के माध्यम से हाथ का हुनर सीखी हैं, वह जीवनभर इस काम को करती रहेंगी, उन्हें अब यह काम अच्छा लगता है।

1500 से अधिक महिलाओं को दे चुकी हैं प्रशिक्षण

नीलम ने बताया कि वह अब स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण देने का भी काम करती हैं। विश्वकर्मा योजना, शहरी समूह योजना सहित अन्य योजनाओं के तहत वह अब तक एटा, मैनपुरी, आगरा, हरदोई और फिरोजाबाद में 1500 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित भी कर चुकी हैं।

छात्रा और स्वयं सहायता समूह में काम करने वाली खुशबू अब्बास बताती हैं कि अपनी पढ़ाई समूह में काम से मिले पैसे से ही करती हूं। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से मुझे पढ़ाई के लिए पैसे भी मिल जाते हैं। वह आगे एमबीए करना चाहती हैं।

रामलली बताती हैं कि वह बुजुर्ग हो गई हैं, लेकिन स्वयं सहायता समूह के माध्यम से उन्होंने एक नई दुनियां देखी है। एक नया हुनर सीखा है, इसके साथ ही वह समूह की प्रदर्शनी के लिए देश के कई शहरों में भी जा चुकी हैं।

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