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बुलंदशहर सामूहिक हत्याकांड मामले 7 साल बाद आया सुप्रीम फ़ैसला, सेंट्रल जेल में निरुद्ध 3 लोग बरी

by admin
Supreme decision came after 7 years in Bulandshahr mass murder case, 3 people detained in Central Jail acquitted

Agra. वर्ष 2014 में बुलंदशहर में हुए सामूहिक हत्याकांड के मामले में दोषी सिद्ध किए गए जयकम खान, उनके बेटे साजिद और रिश्तेदार मोमिन को सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद आगरा केंद्रीय कारागार से भी रिहाई मिल गई। जैसे ही वो जेल से बाहर निकले उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने अल्लाह को याद किया और शुक्रिया कहते हुए कहा कि आखिरकार सच्चाई की जीत हुई और उन्हें न्याय मिल ही गया।

परिवार से मिलकर छलका दर्द

केंद्रीय कारागार से रिहाई की सूचना पर जयकम खान की पत्नी हसमत, बेटा जाकिर और रिश्तेदार उन्हें लेने आगरा आ गए थे। अपने पति और बेटे को जेल से रिहा देख पत्नी हसमत की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जेल से छूटे सभी की आंखों में आंसू थे तो कितने साल जेल में रहने का दर्द भी उनकी आंखों से छलक रहा था। जयकम खान का कहना था कि उन्हें कोर्ट पर पूरा भरोसा था। न्याय की जीत हुई है। उन्हें निर्दोष फंसाया गया था। पत्नी हसमतिया का कहना था कि घटना के बाद पुलिस ने पति और बेटे को जेल भेज दिया, जबकि उनका कोई दोष नहीं था।

वर्ष 2014 में हुई थी छह लोगों की मौत

बता दें कि जनवरी 2014 में बुलंदशहर के गांव पिलखना में सामूहिक हत्याकांड को अंजाम दिया गया था। इसी हत्याकांड में मौसम, उनकी पत्नी असगरी, बेटे शौकीन, पुत्रवधू सन्नो, नाती समद और नातनी मुस्कान की धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में जयकम खान, उनके बेटे साजिद और मौसम के बेटे मोमिन को फांसी की सजा सुनाई गई थी।

स्थानीय कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

निचली अदालत ने सभी को दोषी करार देकर जेल भेज दिया था। पीड़ित हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और हाईकोर्ट ने भी सजा की पुष्टि की थी। बाद में साजिद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस दौरान पीड़ित के वकील की ओर से ऐसे तथ्य रखे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी अनदेखा नहीं कर पाए और कोर्ट में चली बहस को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने तीनों को बरी कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने की थी यह टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में निचली अदालत के निष्कर्षों पर आश्चर्य व्यक्त किया। एक पैराग्राफ का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा, एक कहानी के तौर में यह पढ़ने में तो दिलचस्प है लेकिन सभी टिप्पणियां अनुमानों पर हैं। कोई सुबूत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वे आरोपी को मौत की सजा देते समय गहनता से परीक्षण करें और सावधानी बरतें।

7 साल जेल में रहने से बदली जिंदगी

पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि लगभग 7 साल जेल में रहने के बाद परिवार की भी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है। जब तक न्यायालय का फैसला उनके पक्ष में नहीं था। लोगों ने दूसरी निगाह से देखने लगे थे। जैसे उन्होंने ही इस हत्याकांड को अंजाम दिया हो लेकिन 7 साल बाद फैसला उनके पक्ष में आया है तो पिछले 7 सालों में जो उनके साथ हुआ उसमें बदलाव की उम्मीद जगी है।

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